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सोना-चांदी को इनवेस्टमैंट मानना हो सकती आपकी भूल!

ज्वैलर्स बड़ी चालाकी से ग्राहकों को सोने-चांदी में बना रहे ठगी का शिकार, बिल का भलीभांति करे अवलोकन हरियाणा रथ विशेष

हरियाणा रथ विशेष : रेवाड़ी। हिन्दू धर्म में दिवाली के अवसर पर सोना-चांदी खरीदने को शुभ माना जाता है, किन्तु कुछ ज्वैलर्स इस मौके का लाभ उठाकर सोना-चांदी में ग्राहकों को जमकर चूना लगा देते है। जो ग्राहक ज्वैलर्स पर आंख मंूदकर भरोसा करके उनसे सोना-चांदी खरीदता है और बाद में जब आभूषणों में मिलावट की बात पता चलती है तो उनके पास पछताने के अलावा कोई चारा नही होता है जबकि दूसरी ओर मिलावट करने वाला ज्वैलर्स ग्राहक की जेब काटकर मोटा मुनाफा कमा चुका होता है। सोना-चांदी में कितना भारी मुनाफा ज्वैलर्स कमा रहे है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जो ज्वैलर्स किसी कोने में छोटी सी दुकान करके बैठा था, थोड़े ही समय बाद किसी अन्य स्थान अथवा उसी जगह पर उसका आलिशान शोरूम बन जाता है। जबकि इसके विपरित जो ग्राहक इनसे सोना-चांदी इनवेस्टमैंट के उद्देश्य से खरीदता है, उन्हे मार्किट में सोना-चांदी की वह कीमत भी नही मिल पाती है जो उसने इसे खरीदने में खर्च की थी। इसका बड़ा कारण है सोने-चांदी में मिलावट का खेल। जब ग्राहक जरूरत के समय सुरक्षित रखे हुए सोने-चांदी को बेचने के लिए बाजार में निकलता है, तब जाकर उसे मालूम होता है कि ज्वैलर्स ने जो सोना-चांदी सौ प्रतिशत शुद्धता की गारंटी के साथ उसे बेचा था, उसमें तो खोट है। यदि ग्राहकों के अनुभव को सही माने तो रेवाड़ी शहर में भी ऐसे बहुत से ज्वैलर्स है जिनसे खरीदे हुए जेवरों में ना केवल खोट निकली है अपितु जब भी उन्हे मौका मिलता है सरकार को भी टैक्स में जमकर चूना लगा देते है।

सोने में मिलावट का खेल ग्राहक इसलिए नही पकड़ पाते थे:

जब कोई ग्राहक सोना-चांदी किसी ज्वैलर्स की दुकान से खरीदता है तो उसे यकीन दिलाया जाता है कि इसमें कोई मिलावट नही है। जरूरत के समय अमूमन ग्राहक अपना सोना उसी ज्वैलर्स को बेचने के लिए जाता है जिससे वह खरीदता है और इसमें ज्वैलर्स को कोई परेशानी नही होती है। किन्तु यदि ग्राहक उसी सोने को किसी अन्य ज्वैलर्स के पास बेचने जाये तो उसकी असली परख सामने आती कि उसमें कितनी मिलावट है और उसकी वास्तविक बाजारी कीमत कितनी है। यदि कहा जाये कि पहले बहुत से ज्वैलर्स मिलावटी सोना बेचकर बिना ब्याज ग्राहकों की पूंजी का उपयोग करते है तो कुछ गलत नही होगा। इसको ऐसे समझा जा सकता है कि यदि कोई ग्राहक 50 हजार का सोना खरीदता है और मिलावट की स्थिति में उसकी असल कीमत ३5 हजार ही बनती है तो ऐसा सोना बेचकर ज्वैलर्स बड़े आराम से 15 हजार रूपये ग्राहक की जेब से बिना ब्याज निकाल लेता था। भविष्य में यदि वह ग्राहक उसी ज्वलैर्स के पास सोना बेचने वापिस जाता है तो उस ज्वलैर्स को सोने की वर्तमान कीमत अनुसार एक ग्राम की कटौती करके लगाने में कोई दिक्तत नही होती है क्योकि वह पहले ही उस ग्राहक की जेब से 15 हजार रूपये फिजूल के प्राप्त कर चुका होता है। ग्राहक को असलियत का सामना तब पता चलता है, जब वह इसे किसी अन्य दुकान पर जाकर बेचता है अथवा इसकी परख किसी विश्वसनीय ज्वलैर्स से व लैब से करवाता है।

हॉल मार्क व टेस्ट लैब के कारण मजबूरी बना शुद्ध

सोना जब से सोने पर हॉल मार्क अनिवार्य कर दिया है तब से ज्वैलर्स के लिए सोने की शुद्धता को बनाये रखना मजबूरी हो गया है, क्योंकि हॉल मार्क में नियत किया हुआ है कि सोना 92 प्रतिशत शुद्ध होना ही चाहिए। कहावत है कि चोर चोरी से जाये पर हेराफेरी से नही जाये।
हॉल मार्क अनिवार्यता के बावजूद भी सरकार ने 8 प्रतिशत सोने में मिलावट का दरवाजा खोल रखा है जिसका मिलावट में विश्वास रखने वाले ज्वलैर्स पूरा-पूरा लाभ उठाते है। सोने के खेल में ग्राहकों से पैसों की धोखाधड़ी यही नही होती अपितु बिल देते समय भी खूब होती है जिसको सामान्य तौर पर ग्राहक पकड़ नही पाता है। ज्वैलर्स बड़ी चालाकी से सोने की पूरी कीमत जीएसटी लगाकर ग्राहक की जेब से निकाल लेता है जिसमें ज्वैलर्स की मेकिंग चार्ज, वेस्टेज चार्ज आदि भी शामिल होते है। किन्तु जब ग्राहक उसी सोने को वापिस ज्वलैर्स को बेचता है तो मेकिंग चार्ज काटकर भी ग्राहक को पूरी कीमत नही मिलती है क्योंकि ज्वैलर्स सोने बेचते समय वेस्टेज तक का पैसा ग्राहक से वसूला था, किन्तु वही सोना वापिस लेते समय ज्वैलर्स वेस्टेज के नाम पर कीमत में कटौती कर देता है। इस प्रकार ज्वैलर्स ग्राहक से सोना बेचते समय भी मुनाफा कमाता है और खरीदते समय भी।

Pankaj

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